जानिए राजा राम मोहन राय के बारे में अनसुनी बातें, गूगल ने डूडल बनाकर खास अंदाज में किया याद


महान समाज सुधारक, चिंतक, दार्शनिक और विद्वान राजा राम मोहन राय की 246वीं जयंती पर गूगल ने बड़े ही खास अंदाज में डूडल बनाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। राजा राम मोहन राय को आधुनिक भारतीय समाज का निर्माता’ कहा जाता है। गूगल के डूडल पर क्लिक करते ही राजा राम मोहन राय से जुड़े तमाम पेज खुल जाएंगे, जो उनसे जुड़ी विभिन्न तरह की सामाग्री से भरे हुए हैं।

भारतीय समाज को कुरीतियों के पिंजड़े से आजाद कराने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। आधुनिक भारत के निर्माता और भारतीय पुर्नजागरण के जनक के तौर पर जाने वाले राजा राम मोहन राय ने 19वीं सदी में समाज सुधार के लिए व्यापक आंदोलन चलाए।

जानिए कैसे मिली “राजा” की उपाधि-

राजा राम मोहन राय ब्रह्म समाज के संस्थापक, देश के अंदर सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन के प्रणेता थे। धार्मिक और सामाजिक विकास के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का नाम सबसे अग्रणी है। मुगल सम्राट का जो उन्होंने ब्रिटिश शासक के सामने पक्ष रखा था, इसके एवज में मुगल शासक ने उनको राजा की उपाधि दी थी।

सामाजिक कुरूतियों का किया था विरोध-

आज हम सामाजिक बुराई पर खुलकर बात कर सकते हैं, इन बुराइयों के खिलाफ कई कड़े कानून भी बने हैं। लेकिन भारत में 200 साल पहले ये कुरीतियां इस समाज का अंग थीं। जिनका उल्लंघन करने का साहस किसी में नहीं था। बाल विवाह हो या सती प्रथा इन कुरीतियों का शिकार खासकर महिलाएं थीं। इन बुराइयों के खिलाफ बोलने का साहस तो दूर की बात थी। महिलाएं इन्हें अपनी नियति मान अपने जीवन की बलि चढ़ा देती थीं।

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महिलाओं को आजादी के पंख देने वाले राजा राम मोहन राय का जन्म पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के राधानगर गांव में 22 मई 1772 को हुआ था। 15 वर्ष की आयु तक उन्हें बंगाली, संस्कृत, अरबी और पारसी भाषा का ज्ञान हो गया था। किशोरावस्था में उन्होंने काफी भ्रमण किया और 1803-1814 तक ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए काम भी किया। अंग्रेजी भाषा और सभ्यता से प्रभावित राय 17 वर्ष की आयु में मूर्ति पूजा के विरोधी हो गए थे।

हिंदू कॉलेज की स्थापना-

राजा राम मोहन राय भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव के समर्थक थे। उनका मानना था कि भारत की प्रगति केवल उदार शिक्षा के द्वारा होगी, जिसमें पश्चिमी विद्या तथा ज्ञान की सभी शाखाओं की शिक्षण व्यवस्था हो। उन्होंने ऐसे लोगों का पूरा समर्थन किया, जिन्होंने अंग्रेजी भाषा और पश्चिमी विज्ञान के अध्ययन का भारत में आरंभ किया और वह अपने प्रयासों में सफल भी हुए। इसी विचारों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने हिंदू कॉलेज की स्थापना में बड़ा योगदान दिया जो उन दिनों की सर्वाधिक आधुनिक संस्था थी।

समाचार पत्रों की स्वतंत्रता में योगदान-

अप्रैल 1822 ई. में राजा राममोहन राय ने फारसी भाषा में एक साप्ताहिक अखबार ‘मिरात-उल-अखबार’ नाम से शुरू किया, जो भारत में पहला फारसी अखबार था। साम्राज्यवादी ब्रिटिश सरकार को राजा राममोहन राय के धार्मिक विचार और इंग्लैंड की आयरलैंड विरोधी नीति की आलोचना पसंद नहीं आई।

सरकार ने प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के लिए अध्यादेश जारी किया, जिसके विरोध में राजा राममोहन राय ने ‘मिरात-उल-अखबार’ का प्रकाशन बंद कर दिया। राजा राममोहन राय ने समाचार पत्रों की स्वतंत्रता के लिए भी कड़ा संघर्ष किया था। उनके आन्दोलन का ही नतीजा था कि 1835 ई. में समाचार पत्रों की आजादी का रास्ता खुला।

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राजा राम मोहन राय ने ब्रह्ममैनिकल मैग्जीन, संवाद कौमुदी, मिरात-उल-अखबार, बंगदूत जैसे स्तरीय पत्रों का संपादन और प्रकाशन भी किया। वहीं उनके द्वारा संपादित बंगदूत की बात करें तो यह एक अनोखा पत्र था। जिसमें बंग्ला, हिंदी और फारसी भाषा का एक साथ प्रयोग किया जाता था।

इतना ही नहीं वह साल 1830 में मुगल साम्राज्य का दूत बनकर ब्रिटेन भी गए थे। इसके बाद 27 सितंबर 1833 को उनका इंग्लैंड में निधन हो गया। ब्रिटेन के ब्रिस्टल नगर के आरनोल वेल कब्रिस्तान में राय की समाधि है। उनके सुधार कार्यों के द्वारा वह भारतीय समाज के बीच आज भी जीवित हैं।