पाक को घुटनों पर लाने वाले मार्शल अर्जन सिंह का अंतिम संस्कार, दी गयी 17 तोपों की सलामी


1965 की जंग में एक घंटे के अंदर पाकिस्तान को घुटनों पर ला देने वाले भारतीय वायु सेना के जांबाज मार्शल अर्जन सिंह को सोमवार को आखिरी विदाई दी गई। दिल्ली के बरार स्क्वेयर में अर्जन सिंह का पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। मार्शल को 17 तोपों और फ्लाई पास्ट से सलामी दी गई। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे थे। तीनों सेनाओं के प्रमुख भी मौजूद थे।

arjan singh

मार्शल अर्जन के सम्मान में आज सभी सरकारी इमारतों में राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका दिया गया है। इसके पहले रविवार को उनके आवास पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण समेत तमाम गणमान्य लोग पहुंचे थे। 98 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से उनका शनिवार को निधन हो गया था।

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अर्जन सिंह वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के नायक थे और इकलौते वायु सेना अधिकारी थे, जिन्हें ‘फाइव स्टार रैंक’ दिया गया था। उनका 98 वर्ष की उम्र में कल यहां निधन हो गया। उन्हें 44 वर्ष की आयु में ही भारतीय वायु सेना का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी दी गई जिसे उन्होंने शानदार तरीके से निभाया। वर्ष 1965 की लड़ाई में जब भारतीय वायु सेना अग्रिम मोर्चे पर थी तब वह उसके प्रमुख थे।

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19 साल की अवस्था में अर्जन सिंह ने रॉयल एयर फोर्स कॉलेज जॉइन किया था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने बर्मा में बतौर पायलट और कमांडर अद्भुत साहस का परिचय दिया। अर्जन सिंह की कोशिशों के चलते ही ब्रिटिश भारतीय सेना ने इंफाल पर कब्जा किया जिसके बाद उन्हें डीएफसी की उपाधि से नवाजा गया। 1950 में भारत के गणराज्य बनने के बाद अर्जन सिंह को ऑपरेशनल ग्रुप का कमांडर बनाया गया। यह ग्रुप भारत में सभी तरह के ऑपरेशन के लिए जिम्मेदार होता है।

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अलग-अलग तरह के 60 से भी ज्यादा विमान उड़ाने वाले सिंह ने भारतीय वायु सेना को दुनिया की सबसे शक्तिशाली वायु सेनाओं में से एक बनाने और विश्व में चौथी सबसे बड़ी वायु सेना बनाने में अहम भूमिका निभाई थी. बहुत कम बोलने वाले व्यक्ति के तौर पर पहचाने जाने वाले सिंह ना केवल निडर लड़ाकू पायलट थे बल्कि उनको हवाई शक्ति के बारे में गहन ज्ञान था जिसका वह हवाई अभियानों में व्यापक रूप से इस्तेमाल करते थे. उन्हें 1965 में देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।


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