आज से 125 साल पहले तिलक ने की थी समुद्र किनारे गणेशोत्सव की शुरुआत, जो बनी राष्ट्रीय एकता का प्रतीक


आज 25 अगस्‍त से गणेशोत्‍सव की शुरुआत हो रही है। इस बार गणेशोत्‍सव बेहद खास है क्‍योंकि इसे पूरे 125 साल हो रहे हैं। आज के दिन प्रथम पूज्य को मनाने के लिए लोग हर तरह का जतन करते है। देश में चाहे नेता हो या अभिनेता या फिर एक साधारण व्यक्ति सब मिलकर गणेश जी विघ्नहर्ता की विशेष पूजा करते है और इस त्योहार को बड़ी धूमधाम से मनाते है।

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देश में विशेष तौर पर महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी पर पूजा की जाती है। आज से ठीक 125 साल पहले महाराष्‍ट्र के पुणे में 1893 में लोकमान्‍य बाल गंगाधर तिलक ने जनता को आजादी की लड़ाई में एकजुट करने के लिए इसकी शुरुआत की थी।

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आइए जानते हैं कैसे शुरू हुआ था गणेशोत्‍सव?

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक1890 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अक्‍सर चौपाटी पर समुद्र के किनारे जाकर बैठा करते थे और सोचते थे कि कैसे लोगों को एकजुट किया जाए। एक दिन अचानक उनके दिमाग़ में विचार आया कि क्यों न गणेशोत्सव को घरों से निकाल कर सार्वजनिक स्थल पर मनाया जाए, ताकि इसमें हर जाति के लोग शिरकत कर सकें। एक हो सकें और उनके साथ देश की आजादी को लेकर चर्चा की जा सके। उसके बाद तिलक ने गणेशोत्सव को समुद्र के किनारे मनाने का फैसला किया।

 

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हालाँकि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को काफी समस्याओं और विरोध का सामना करना पड़ा था। सन् 1894 में कांग्रेस के उदारवादी नेताओं के भारी विरोध की परवाह किए बिना लोकमान्य तिलक ने इस गौरवशाली परंपरा की नींव रख ही दी। बाद में सावर्जनिक गणेशोत्सव स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को एकजुट करने का जरिया बना।

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विघ्‍नहर्ता गणेश पूजा भारत में प्राचीन काल से होती रही है, लेकिन पेशवाओं ने गणेशोत्सव का त्यौहार मनाने की परंपरा शुरू की। कहते हैं कि पुणे में कस्बा गणपति नाम से प्रसिद्ध गणपति की स्थापना शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई ने की थी। परंतु लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव को को जो स्वरूप दिया उससे गणेश राष्ट्रीय एकता के प्रतीक बन गये।

 

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वीर सावरकर और कवि गोविंद ने गणेशोत्सव मनाने के लिए किया मित्रमेला संस्था का निर्माण-

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने जनमानस में सांस्कृतिक चेतना जगाने और लोगों को एकजुट करने के लिए ही सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरूआत की। इसके बाद बीसवी सदी में तो सार्वजनिक गणेशोत्सव बहुत ज़्यादा लोकप्रिय हो गया। वीर सावरकर और कवि गोविंद ने नासिक में गणेशोत्सव मनाने के लिए मित्रमेला संस्था बनाई थी।

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इस संस्‍था का काम था देशभक्तिपूर्ण मराठी लोकगीत पोवाडे आकर्षक ढंग से बोलकर सुनाना। पोवाडों ने पश्चिमी महाराष्ट्र में धूम मचा दी थी। कवि गोविंद को सुनने के लिए भीड़ उमड़ने लगी. राम-रावण कथा के आधार पर लोगों में देशभक्ति का भाव जगाने में सफल होते थे। लिहाज़ा, गणेशोत्सव के ज़रिए आजादी की लड़ाई को मज़बूत किया जाने लगा। इस तरह नागपुर, वर्धा, अमरावती आदि शहरों में भी गणेशोत्सव ने आजादी का आंदोलन छेड़ दिया था।

 

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सार्वजनिक गणेशोत्सव से अंग्रेज घबरा गए थे। इस बारे में रोलेट समिति की रिपोर्ट में भी गंभीर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में कहा गया था गणेशोत्सव के दौरान युवकों की टोलियां सड़कों पर घूम-घूम कर अंग्रेजी शासन का विरोध करती हैं और ब्रिटेन के ख़िलाफ़ गीत गाती हैं।

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अंग्रेजों को रिपोर्ट मिली की गणेशोत्‍सव की सभाओं में स्कूली बच्चे पर्चे बांटते हैं। जिसमें अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने और शिवाजी की तरह विद्रोह करने का आह्वान होता था इतना ही नहीं, अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए धार्मिक संघर्ष ज़रूरी बताया जाता है। सार्वजनिक गणेशोत्सवों में भाषण देने वाले में प्रमुख राष्ट्रीय नेता तिलक, सावकर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, रेंगलर परांजपे, मौलिकचंद्र शर्मा, दादासाहेब खापर्डे और सरोजनी नायडू होते थे।

 

 

इस गणेशोत्सव का असर यह हुआ कि लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक उस समय युवा क्रांतिकारी दल के नेता बन गए थे। तिलक प्रभावी ढंग से भाषण देने में भी माहिर हो गए थे।


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