भारतीय संस्कृति को गौरव और सम्मान देते हैं मिट्टी के दिए


दीपावली हिन्दुओं का सबसे प्रमुख त्यौहार है। उससे जुड़ी हर वस्तु की खरीदारी हम वक़्त से पहले ही कर लेते हैं |इन्हीं सब वस्तुओं में से एक हैं मिट्टी के दिए। पहले जहाँ कुम्हारों से साधारण दिए खरीदे जाते थे, आजकल वही अब कई रंगों और परिवेशों में मिलने लगे हैं। इतना तो सभी को पता है कि दिए दिवाली पर लेने चाहिए, लेकिन क्यूँ लेने चाहिए ये शायद किसी को भी पूर्ण रूप से नहीं पता है। आइये जानते हैं दिए और उनके दिवाली में महत्त्व से जुड़ी कुछ अहम् बातें।

कहते हैं जैसे श्री राम ने रावण का वध कर बुराई के ऊपर अपनी जीत स्थापित की थी, उसी प्रकार दिया भी अँधेरे को मिटा रौशनी फैलाता है। अँधेरा यहाँ बुराई और दिए की रौशनी अच्छाई का प्रतीक है। कहते हैं की दीयों को जला हम अपने मन और जीवन में फैले अंधकार को दूर कर उन्हें फिर से रोशन बनाते है।

लोग ऐसा मानते हैं की दिया जलने से जो भी जिंदगी में नकरात्मक उर्जा मोजूद होती है, वह धीरे धीरे सकरात्मक उर्जा में परिवर्तित हो जाती है। यही नहीं, जिस तरह दिए की बाती सभी तकलीफों को झेल जलती रहती है, वैसे ही हमें भी कभी परेशानियों से डर कर हार नहीं माननी चाहिए और कोशिश करते रहना चाहिए।

प्राचीन समय में दिए की रौशनी से ही लोग पढ़ाई करते थे। लाइट के आने से दिए जलने तो बंद हो गए लेकिन अभी भी कई लोग दिवाली पर जलते दीयों से पढ़ाई में एकाग्रता और मन लगने की प्रार्थना करते हैं।

आदमी मिट्टी के दीए में स्नेह की बाती और परोपकार का तेल डालकर उसे जलाते हुए भारतीय संस्कृति को गौरव और सम्मान देता है क्योंकि दीया भले मिट्टी का हो मगर वह हमारे जीने का आदर्श है।

हमारे जीवन की दिशा है, संस्कारों की सीख है, संकल्प की प्रेरणा है और लक्ष्य तक पहुंचने का माध्यम है। दीपावली मनाने की सार्थकता तभी है जब भीतर का अंधकार दूर हो। भगवान महावीर ने दीपावली की रात जो उपदेश दिया उसे हम प्रकाश पर्व का श्रेष्ठ संदेश मान सकते हैं।

भगवान महावीर की यह शिक्षा मानव मात्र के आंतरिक जगत को आलोकित करने वाली है। तथागत बुद्ध की अमृत वाणी ‘अप्पदीवो भवः’ अर्थात आत्मा के लिए दीपक बन वह भी इसी भावना को पुष्ट कर रही है। दीपावली पर्व लौकिकता के साथ-साथ आध्यात्मिकता का अनूठा पर्व है।

हमारे भीतर अज्ञान का तमस छाया हुआ है। वह ज्ञान के प्रकाश से ही मिट सकता है। ज्ञान दुनिया का सबसे बड़ा प्रकाश दीप है। जब ज्ञान का दीप जलता है तब भीतर और बाहर दोनों आलोकित हो जाते हैं। अंधकार का साम्राज्य स्वतः समाप्त हो जाता है। ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता केवल भीतर के अंधकार मोह-मूर्च्छा को मिटाने के लिए ही नहीं अपितु लोभ और आसक्ति के परिणामस्वरूप खड़ी हुई पर्यावरण प्रदूषण और अनैतिकता जैसी बाहरी समस्याओं को सुलझाने के लिए भी जरूरी है।